रजनीश ठाकुर की फिल्म मेरे दोस्त पिक्चर अभी है का विषय रोचक और प्रासंगिक है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी नए निर्देशक के लिए अपनी रुचि और सोच की फिल्म बना पाने की अनेक कठिनाइयां हैं। अमर जोशी (सुनील शेट्टी) फिल्म बनाने की कोशिश में भटकता है और फिर अपनी स्थितियों से समझौता कर फिल्म इंडस्ट्री के रंग में रंग जाता है।
रजनीश ठाकुर ने फिल्म के नायक के लिए बनारस के अमर जोशी को चुना है। फिल्म निर्देशन सीखने के लिए अमर जोशी खुद के इंतजाम से पहले लंदन जाता है। लंदन से फिल्म डायरेक्शन की पढ़ाई पूरी कर वह मुंबई लौटता है। वह एक सारगर्भित आर्ट हाउस फिल्म बनाना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां उसके अनुकूल नहीं बन पातीं। फिल्म बनाने के क्रम में वह भांति-भांति के निर्माताओं से मिलता है। आखिरकार उसकी फिल्म पूरी होती है, लेकिन उसकी कहानी और प्रस्तुति बदल चुकी होती है। बहरहाल, उसकी भ्रष्ट फिल्म सफल होती है। फिल्म के अंत में हम देखते हैं कि अमर जोशी आर्ट, उद्देश्य, गंभीर सिनेमा को भूल कर कमर्शियल चपेट में आ चुका है। और खुश भी है।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अधिकांश महात्वाकांक्षी युवा निर्देशकों की यही नियति है।
इस उम्दा सोच की फिल्म को रजनीश ठाकुर उम्दा तरीके से पेश नहीं कर पाए हैं। उनके सामने भी अमर जोशी मजबूरियां रही होंगी। तभी उन्हें अमर जोशी जैसे असहाय किरदार में सुनील शेट्टी को लेना पड़ा होगा। सुनील शेट्टी की चाल-ढाल और छवि में अमर जोशी की बेचारगी नहीं है। पूरी फिल्म मुख्य रूप से सुनील शेट्टी और राजपाल यादव पर टिकी हुई। दोनों फिल्म को रोचक बनाए रखने की भरपूर कोशिश भी करते हैं, लेकिन सहयोगी पात्रों और समुचित प्रसंगों एवं दृश्यों के अभाव में असफल साबित होते हैं। ओम पुरी और नीना गुप्ता समेत सभीे कलाकारों का अभिनय साधारण या उससे भी निचले स्तर का है। अच्छे व्यंग्य की संभावना की यह फिल्म कमजोर पटकटथा, अयोग्य कलाकारों और अकुशल निर्देशन की वजह से भटक गई है। एक निहायत कमजोर फिल्म बन सकी है।

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